तकनीक के सहारे अपनी जड़ों से जुड़ रही नई पीढ़ी, गढ़वाली–कुमाऊंनी को बचाने की पहल

तकनीक के सहारे अपनी जड़ों से जुड़ रही नई पीढ़ी, गढ़वाली–कुमाऊंनी को बचाने की पहल

देहरादून: नई पीढ़ी का दायरा अब केवल अपने जिले या प्रदेश तक सीमित नहीं रह गया है. शिक्षा, रोजगार और तकनीक के विस्तार के साथ युवा देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना रहे हैं. लेकिन इस वैश्विक जुड़ाव का असर अब क्षेत्रीय संस्कृति और बोली-भाषाओं पर भी साफ दिखाई देने लगा है. धीरे-धीरे युवा विदेशी और राष्ट्रीय भाषाओं तक ही सीमित होते जा रहे हैं, जिससे उनका अपनी मातृभाषा और स्थानीय संस्कृति से रिश्ता कमजोर पड़ता जा रहा है. यह स्थिति क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है.

 

पहाड़ की बोली-भाषाओं को बचाने की कवायद: उत्तराखंड भले ही 13 जिलों वाला एक छोटा राज्य हो, लेकिन यहां भाषाई विविधता बेहद समृद्ध है. कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बोली में बदलाव देखने को मिलता है. राज्य में मुख्य रूप से गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोलियों का प्रचलन है, जो पीढ़ियों से लोगों की सांस्कृतिक पहचान रही हैं. हालांकि समय के साथ युवाओं का रुझान इन क्षेत्रीय बोलियों की ओर कम हुआ है, जो भविष्य में इनके संकट में पड़ने की ओर इशारा करता है.पीएम मोदी ‘मन की बात’ में कर चुके हैं रं भाषा का उल्लेख: स्थानीय बोली-भाषाओं का संरक्षण सामाजिक रूप से हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मन की बात कार्यक्रम के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण पर जोर दे चुके हैं. उन्होंने उत्तराखंड के धारचूला क्षेत्र में रं समाज द्वारा अपनी बोली को बचाने के प्रयासों की सराहना करते हुए इसे देश के लिए प्रेरणादायक बताया था. तकनीक के सहारे अपनी जड़ों से जुड़ रही नई पीढ़ी: इन्हीं चुनौतियों को समझते हुए उत्तराखंड के भाषा विभाग ने युवाओं को क्षेत्रीय बोलियों से जोड़ने के लिए एक नई पहल की है. विभाग ने एक विशेष मोबाइल एप की शुरुआत की है, जिसके माध्यम से युवा किसी भी भाषा में लिखे गए शब्दों या वाक्यों को गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोली में अनुवाद कर सकते हैं. इस तकनीकी पहल का उद्देश्य क्षेत्रीय भाषाओं को युवाओं के लिए सरल, रोचक और सुलभ बनाना है.

 

भाषा मंत्री सुबोध उनियाल को उम्मीद: खास बात यह है कि यह प्रयास युवाओं को अपनी भाषा से जोड़ने के लिए तकनीक का सहारा ले रहा है, जिससे उनमें रुचि भी बढ़ रही है. भाषा विभाग के मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि- युवाओं को अपने क्षेत्र, संस्कृति और भाषा से जोड़ना बेहद जरूरी है. इसके लिए न केवल युवाओं को प्रयास करने होंगे, बल्कि सरकार और समाज को भी मार्गदर्शक की भूमिका निभानी होगी. भाषा विभाग की यह पहल युवाओं को गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी से जोड़ने में मददगार साबित होगी. इसके माध्यम से वे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी बेहतर ढंग से समझ सकेंगे.

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